Friday, May 14, 2010

कैसी विडम्बना !

यूँ तो पिछले ६ वर्षों में मैंने और मेरे दोस्तों ने रूस के हर मौषम का खूब आनंद लिया, लेकिन आज क्यूँ मुझे ऐसा लगने लगा की लोग आनंद उठाने से ज्यादा दिखावा करने में विश्वास रखते हैं? कल तक जब हम यहाँ के कड़ाके की शर्दियों में बहार घुमा करते थे, तब किसीने मुझसे यह नहीं कहा था, की "भारत की अपेक्षा यहाँ काफी ज्यादा ठण्ड है, हम यहाँ कैसे जी पाएंगे?" तो फिर आज अचानक सबको क्या हो गया? क्या एकाएक सबको दिखावे का सौख चढ़ गया, या फिर मेरे देखने और सोंचने का नजरिया बदल गया? कल तक यहाँ के -३०' तापमान में, जब की मनुष्य की हड्डियाँ तक ठण्ड से जमने लगती हैं, तब किसीको भारत और रूस के तापमान और रहन-सहन की तुलना करने की नहीं सूझी थी, लेकिन आज अचानक सबको क्या हो गया है, जो सभी एक एक कर यह कहते हैं कि "अब हम भारत जा रहे हैं, अब वहां कैसे रह पाएंगे?" मुझे न जाने क्यूँ, उनका ये सवाल बड़ा उटपटांग सा लगता है!

८ मई के दिन जब यहाँ का पारा चढ़ कर +३२' पर पहुँच गया तब सभी के मुह से एक ही बात निकल रही थी, कि, "बहुत ज्यादा गर्मी है, भारत में तो और भी ज्यादा गर्मी पड़ रही है, हम एक महीने बाद जब भारत जायेंगे, तब वहां कैसे रह पाएंगे?" क्या सब यह भूल गए हैं, कि हम भारत की मिटटी में ही जन्मे हैं, और अपने जन्म से अब तक के जीवन का ८५% समय हमने भारत में ही गुजरा है? या तो फिर मैं ही एक नया आर्टिकल लिखने के लिए इस बात को बेवजह तूल दे रहा हूँ? मैंने बहुत सोंचने की कोशिश की, लेकिन मुझे यह नहीं समझ आ रहा है, की यह कैसी विडम्बना है लोगों की, जो की आपने खुदके परिवेश से कुछ क्षणों के लिए बाहर आने मात्र से, उसे भूलने और झुठलाने की कोशिश करने लगते हैं? क्या बचपन से किशोरा अवस्था और जवानी की सुरुआत तक हमने भारत में पड़ने वाली गर्मी को नहीं झेला है? क्या घर पर बिजली चले जाने पर हम गर्मी के दिनों में भी बिना पंखे के नहीं रहे हैं? क्या इन बातों को कोई भी भारतीय नकार सकता है? तो फिर आज मेरे दोस्तों को क्या हो गया है? वो ऐसा क्यूँ सोचने लगे हैं की अब वो भारत की गर्मी भरे दिनों में कैसे रहेंगे? या फिर उनके यहाँ के गुजारे हुए महज़ ६० महीने, उनके भारत में गुजरे हुए औसतन २२० महीनों पर भारी पड़ गए हैं?

जब इस विषय पर मैंने उनसे पूछा, की गर्मी तो उन्हें बचपन में भी लगती थी, तब तो कभी ऐसा नहीं सोंचा उन्होंने? तो अब क्यूँ? तो कुछ ने कहा, "अब ठन्डे प्रदेश में रहने की आदत हो गई है" , कुछ का कहना था, "तब हम बच्चे थे, तो सब चल जाता था, अब नहीं सह पाएंगे वहा की गर्मी को" कुछ ने तो घर पहुँचते ही अपने कमरे में एयर कन्दिस्नर तक लगवाने कि बात कर डाली ! मुझे थोड़ी हसी आई, मैं सोंच में पड़ गया, कि जिस गर्मी में रहने की आदत २० सालों से थी, वो आदत महज़ ६० महीने मे बिलकुल बदल गई, तो ६० महीने में लगी आदत को तो महज़ २-३ महीने में ही बदल जाना चाहिए! ख़ैर, जो भी हो, अब भगवन से यही दुआ है, की उनकी आदत जल्द ही बदल जाए, वरना हमारी जन्मभूमि का कलेजा यह सोच कर अन्दर ही अन्दर बड़ा कचोटेगा की उसके बच्चे उसे उसके परिवेश को इतनी जल्दी भूल गए!

लोग कहते हैं की बदलाव ही प्रकृति का नियम है, लेकिन मैं यह समझता हूँ की अगर इसे लोग बदलाव का नाम देते हैं तो यह सरासर गलत है, इसे बदलाव नहीं, बल्कि अपनी असलियत से भागने का नाम देना चाहिए! बहुत से सज्जन मेरे इस अर्टिकल से सहमति नहीं रखते होंगे, तो उनसे मैं पहले ही क्षमा मांग लेना चाहूँगा, और प्रभु से यही प्रार्थना करूँगा की, अपनी जन्मभूमि और उसके परिवेश को भूल कर झूठा दिखावा करने की मति वो किसीको ना दे! धन्यवाद!




अमित~~

3 comments:

abhi126 said...

abhut hi aacha article likha hai, really very impressive,i have no words to say is lekh ki jitni bhi taarif ki jaye kam hai aur mai bhi dua karunga ki log isse sekhe kuch

Dr.amit keshri said...

dhanyawaad bhaia, aapko yaha dekh kar or mere lekh par aapki tippani ko paddh kar mujhe behadd khushi hui, dhanyawaad..



amit~~

SpLeNdIfErOuS StalWaRt said...
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