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Monday, April 19, 2010

धर्म

पिछले १ महीने से मैं कई बार सोंच चूका हूँ, लेकिन समय की कमी और काम में व्यस्तता से उभर कर इस आर्टिकल को लिखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था, अंततः आज मुझे वह समुचित समय मिल ही गया जब मैं इस आर्टिकल को लिख सक रहा हूँ!

आज जब भारत आज़ाद है, और इस आज़ाद भारत में १.२ अरब जितने लोग रहते हैं, तब लोगों को जितनी रोजी रोटी और घर, परिवार की नहीं पड़ी, उससे ज्यादा वे धर्म और जाती के पीछे भाग रहे हैं, किसीको मंदिर चाहिए, तो किसीको मस्जिद, किसीको गुरुद्वारा चाहिए, तो किसीको गिरिजा-घर! देश में हर रोज करीब २७० नवजात शिशु सड़कों, कचरे के डब्बों और नालियों के किनारे फेके हुए पाए जाते हैं, कोई उन्हें घर दिलवाने का नहीं सोच सकता, लेकिन धर्म को मजबूत कैसे करें, ये सोचने का समय हर किसीके पास है, इस संख्या को कम कैसे किया जाए, इसपर कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन धार्मिक दंगों को अंजाम दे कर और भी हज़ारों नवजात शिशुओं को बेघर और अनाथ बनाने का जोखिम हर कोई उठाने को तैयार दीखता है, जिसे देखो अपनी रट लगाये बैठा है, "मैं हिन्दू हूँ", "मैं मुसलमान हूँ", "मैं सिक्ख हूँ" और "मैं इसाई हूँ" कोई माइनोरिटी कहलाता है तो कोई मजोरिटी कहलाता है, किसीको किसीके नवाज़ से परेशानी है, तो किसीको किसीके मन्त्रों से नफरत, इन्ही बातों में उलझे पड़े हैं सभी, और तो और, इतना ही जैसे कम था, अब फॉरवर्ड-बक्वोर्ड और पिछड़ी जाती एवं जनजाति के नाम की एक नयी लड़ाई सुरु कर दी सबने, कोई जाट है तो उसे आरक्षण चाहिए और कोई खुद को दलित कह कर सत्ता पर काबिज़ हो बैठा है, खुद के बनाये इस धर्म और जाती रूपी दलदल में लोग खुद ही इस कदर फंस और उलझ चुके हैं, की किसी को यह नहीं दिख रहा की वो इन सब के चक्कर में अपना असली धर्म पुर्णतः भूल चुके है! "असली धर्म" जिसमे न तो कोई हिन्दू है, और न कोई मुसलमान, न कोई सिक्ख और न ही इसाई, उस धर्म को "मानवता" का नाम दिया गया है, जहाँ केवल और केवल प्यार ही प्यार भरा हुआ है, लेकिन अफ़सोस तो इस बात की है, कि आज किसीको यह धर्म दिख नहीं रहा, हर व्यक्ति एक दुसरे के खून का प्याशा है!

इस विषय पर मैंने कुछ सज्जनों की राय जाननी चाहि, जान कर बड़ी ही हैरानी हुई, क्यूंकि उनमे से सभी का झुकाव अपने अपने धर्म के प्रति था, कुछ तो इतने कट्टर थे की अगर उन्हें आधी रात को भी उनके धर्म के ओर से लड़ने को कहा जाए, तो वो बिना कुछ कहे बड़ी सहजता से किसीकी भी जान ले लेने को तैयार दिखेंगे, लेकिन उनमे से एक भी ऐसा नहीं दिखा, जो मानवता रूपी धर्म के प्रति थोड़ी भी श्रद्धा रखता हो, कोई कह रहा था, "दिनों दिन मुसलामानों की संख्या हमारे देश में बढती जा रही है" कोई कह रहा था की " दिनों दिन हम हिन्दुओं को दबाया जा रहा है" तो कोई कहता था की "लोगों को रोटी, कपडा ओर माकन दे कर उनका धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है, उन्हें इसाई बनाया जा रहा है" लेकिन किसीने यह नहीं कहा, की "हर बार धार्मिक दंगों में हजारों माओं की कोख उजड़ जाती है, हज़ारों औरतों का सुहाग छीन जाता है और लगभग उतने ही बच्चे अनाथ हो जाते हैं", कहीं कोई मंदिर गिराना चाहता है, तो कोई मस्जिद गिराना चाहता है, लेकिन कोई एक बेघर का घर बसाने की बात नहीं करता, धर्म के नाम पर औरतों को विधवा बनाने वाले लोग कभी किसी गरीब की बेटी का व्याह करवाने का नहीं सोचते!

कल का तो पता नहीं, कल किसने देखा है, लेकिन आज मुझे यह सोंच कर खुद पर बहुत शर्म आ रही है की मैं भी उन्ही धर्मों में से एक धर्म का हिस्सा हूँ, और मेरा धर्म भी हज़ारों बेगुनाहों की ज़िन्दगी छिनने का एक बहुत ही बड़ा कारक है, क्या मतलब बनता है भारत की ऐसी आज़ादी का? और क्या मतलब बनता है ऐसे धर्म का, जिसके वजह से इतने बेकसूर बेवजह मारे जा रहे हैं, कोई जेहाद चला रहा है तो कोई शिव, हनुमान और राम के नाम की शेना बना रहा है, कोई किसीका धर्म परिवर्तन करवा रहा है तो कोई मंदिरों और गुरुद्वारों पर सोने जाडवा रहा है! आज सुच मच ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मानवता मर चुकी है, अब कोई मानवता नमक धर्म हमारे इस संसार में बचा ही नहीं है, अब तो शायद धरती भी खुद पर रो देगी और खुद ही प्रकृति से प्रलय का श्राप मांग लेगी, की उसने कैसे मानवों का बोझ उठा रक्खा है, जिनमे जरा भी मानवत बची ही नहीं है!

पिछले कुछ सप्ताहों में मैंने काफी सारे लोगों के ब्लोग्स को पढ़ा और उनके विचारों को जाना, काफी कुछ सिखने को मिला, लेकिन जिसकी मै तलाश कर रहा था, वो अब तक नहीं मिल पाया था कहीं, शायद मेरी तलाश में ही कोई कमी या त्रुटी रही होगी, अब आज मैं खुद ही अकेला धर्म के इस तांडव को लिख रहा हूँ, अगर मेरे इस आर्टिकल से एक भी व्यक्ति को मैं मानवता के राह पर एक कदम भी आगे बाढा सका, तो मैं समझूंगा की मेरा लिखना सफल हो गया, आशा है आप सब का साथ टिप्पणियों के रूप में जरुर मिलेगा!







अमित~~