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Sunday, May 16, 2010

पंख


एक पंख लगा दो मुझको माँ,


जो ऊँचे नभ में उड़ पाऊं मैं,


दूर जहाँ से आना चाहूँ,


बस तेरे पास पहुँच पाऊं मैं!




ना गिरने का डर होगा फिर मुझको,


बादल से भी ऊँचा उड़ पाऊं मैं,


जितना भी ऊँचा मैं चाहूँ,


माँ उतना ऊँचा उड़ जाऊं मैं!




एक पंख लगा दो मुझको माँ,


फिर खुले गगन में खुलकर,


चाँद सूरज से भी ऊँचा उड़ पाऊं मैं,


बस एक आज़ाद पंछी बन कर उड़ता ही चला जाऊं मैं!




थके ना कभी मेरे पर उड़ कर,


माँ बस इतना ही चाहूँ मैं,


पंख विशाल हो बस माँ इतना,


की तुम्हे भी साथ ले उड़ पाऊं मैं!




बस एक पंख लगा दो मुझको माँ,


अब उड़ना ही चाहूँ मैं,


थक चूका हूँ धरा पर बैठा,


आशमान की शैर कर आऊं मैं!




बस अब पंख लगा दो मुझको माँ, अब उड़ना ही चाहूँ मैं!!





अमित~~

Friday, May 7, 2010

नारी तेरे रूप

जननी तू, जन्मभूमि तू,
तू ही है अर्धांगिनी !
सुता, अजा और शक्ति तू,
तू ही कहलाती बामांगिनी!

माता के नव रूपों में तू,
है सीता तू, शावित्री तू!
शिव की आधी शक्ति तू,
पीड़ा सह जग को जीवन देती तू!

मीरा बन भक्ति के पाठ सिखाती,
काली बन जग के प्राण बचाती!
है अबला तू, सबला भी तू,
लक्ष्मी भी तू, तुलसी भी तू!

विद्या के रूपों में है तू,
है श्रृष्टि तू, धरती भी तू!
है जीवन तू और मृत्यु तू,
गंगा भी तू, ममता भी तू!

जग पर क़र्ज़ बड़े हैं तेरे,
तेरे समक्ष शीश झुके हैं मेरे!
नारी, कोटि-कोटि नमन है तुझको,
माँ तू ही है जीवन दाईनि!





अमित~~

Friday, April 16, 2010

माँ अब मैं क्या करूँ?

रातें तो हमेशा काली थीं,
अब दिन भी मेरा अंधेरा हैं,
कबसे आश लगा बैठा हूँ,
नहीं दीखता कहीं सबेरा है,
तुम ही बोलो माँ अब मैं क्या करूँ ?


पता नहीं इस पगडण्डी पर,
कितने ठोकर और पड़ेंगे,
आगे बढते हुए पाँव में,
कितने कांटें और चुभेंगे,
तुम ही बोलो माँ अब मैं क्या करूँ ?


जीवन के इस पगडण्डी पर,
खो बैठा हूँ शायद खुदको,
कदम बढाता हूँ आगे जब,
राह चुभते बन कंकड़-पत्थर,
तुम ही बोलो माँ अब मैं क्या करूँ ?


आंशु रोक रखे हैं मैंने,
पर दिल की धड़कन तेज है,
थक चुका हूँ मैं अब अकेला,
धुन्ड़ता हुआ बस एक सवेरा,
अगर मिला ना वो अब भी मुझको !

तो तुम ही बोलो माँ अब मैं क्या करूँ ?



अमित~~